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जीवित्पुत्रिका व्रत रखने की सही विद्धि और महत्व

जीवित्पुत्रिका व्रत या जिउतिया व्रत को माताएं निर्जला व्रत रखती हैं. हिन्दू मान्यता के अनुसार यह व्रत आश्विन मास की, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन माताओं द्वारा अपने बच्चे की लम्बी आयु के लिए रखा जाता हैं. यह व्रत देश की हिंदी हार्ट लाइन यानी बिहार, मध्य प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में ही लोगों द्वारा मनाया जाता हैं.हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत का सीधा संबंध महाभारत काल से हैं. युद्ध के दौरान जब अश्वत्थामा के पिता की मृत्यु हुई तो वह बहुत ज्यादा क्रोधित हो गया. अपने क्रोध में वह पांडवों के शिविर में चला गया और वहां सो रहे 5 लोगों की जान ले ली, जिसे वह पांडव समझ रहा था. यह पांच लोग द्रौपदी की पांच संतानें थी. जिसके बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि को उससे अलग कर दिया.

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अश्वत्थामा फिर क्रोधित हुआ और उसने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में पल रहे बच्चे को भी मार दिया था. मान्यता है की, भगवान श्री कृष्ण जी ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देते हुए, उन्हें दुबारा जीवित कर दिया. बाद में इस बच्चे का नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा, बस तब से ही माताएं अपने बच्चे की लम्बी उम्र के लिए इस व्रत को रखती आ रहीं हैं.

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इस पर्व में भी छठ पर्व की तरह नहाय-खाय की परंपरा शामिल होती हैं. यह भी 3 दिन का ही पर्व होता है और अष्टमी तिथि को महिलाएं बच्चों की समृद्धि और उन्नत के लिए निर्जला व्रत अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ रखती हैं. इस व्रत को फिर महिलाएं नवमी तिथि यानी अगले दिन खोल भी देती हैं.मान्यता के अनुसार इस व्रत को अगर कोई महिला सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ रखे तो उसे अपनी संतान के वियोग का सामना कभी भी नहीं करना पड़ता. इसके इलावा न ही संतान को लेकर कभी जीवन में दुःख का सामना करना पड़ता है और संतान के चलते घर में सुख और शांति बनी रहती हैं.
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